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अनुराग कश्यप से हाथ मिलाना था बस... — हुसैन हैदरी

कुछ दिन पहले मुझे अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'मुक्काबाज़' के गीतकार हुसैन हैदरी से बात करने का मौका मिला। कई सारे गानों, गीतकारों, संगीतकारों, फिल्मों के बारे में बात हुई, और निश्चित रूप से बात हुई ख़ुद हुसैन और उनके इस सफ़र के बारे में, जिसे तय करते हुए उन्होंने गुड़गांव, क़रीब क़रीब सिंगल, और मुक्काबाज़ में गीत लिखे हैं। उन ढेर सारी बातों में से कुछ मज़ेदार किस्से, और कुछ काम की बातें आपके लिए।

राइटर बनने का कोई प्लान नहीं था

मैं कवितायें लिखता था, लेकिन ऐसा कभी सोचा नहीं था कि इसे काम की तरह करूंगा। सच कहूँ तो ये मान ही लिया था कि अब सारी ज़िन्दगी कॉर्पोरेट जॉब ही करनी है। लेकिन अगस्त 2014 तक कलकत्ता में रहते हुए कुछ ऊब सा चुका था। ऐसा नहीं कि तब लेखक बनने की तैयारी हो गयी हो, लेकिन सब दोस्त वगैरह मुंबई में ही थे, तो लगा कि मुंबई ही चलना चाहिए। लेकिन फिर एजुकेशन लोन भी था चुकाने के लिए, सो एक साल और वहीं काम किया, और 2016 के शुरू में यहाँ चला आया।

गुलज़ार - एक इंटरव्यू [Gulzar - An Interview]

इन्सानी दिमाग भी अजीब चीज़ होती है। इन्सान कभी पहाड़ चाहता तो कभी समन्दर, कभी धूप चाहिए तो कभी छाँव। और कभी कभी धूप से छाँव में आकर भी चाहता है कि अब बारिश ही हो जाये। मुख़्तसर सी बात ये है कि हमारी इच्छाएं कभी ख़त्म नहीं होतीं। शायद यही वजह है कि जहाँ गुलज़ार साहब को मंच पर इंटरव्यू देखते वक़्त जहां हम बल्लियों उछल रहे थे, कुछ वक़्त गुजरने के बाद दिल में कुछ शिकायतें ठहर गयी थीं। अब वो कितनी जायज़ हैं और कितनी नहीं ये आप हिसाब कीजिये, लेकिन पहले गुलज़ार साहब के उस गीतमय इंटरव्यू की कुछ झलकियां आपके लिए।

इंटरव्यू की शुरुआत में एक चीज़ जिस की ओर भावना जी ने ध्यान दिलाया वो ये कि गुलज़ार साहब ने पिछले दशक में तकरीबन बत्तीस फिल्मों के लिए गीत लिखे जो उनके पिछले दशक के काम से भी कहीं ज़्यादा है। इस दशक में भी वो करीब सोलह फिल्मों के लिए गीत लिख चुके हैं।

खैर, आज के कार्यक्रम का ढांचा कुछ इस तरह से था कि कुछ गीत बजाये गए और गुलज़ार साहब ने ये बताया कि उस गीत का जन्म किस तरह से हुआ। कई जगहों पर गीत के बनने की कहानियाँ मिलीं तो कहीं कहीं गीतों से जुड़े लोग और यादें।

पहला गीत था गुलज़ार साहब का पहला गीत, मोरा गोरा अंग लई ले। इस गीत से जुड़ी कई सारी कहानियां थीं। पहली कहानी - गुलज़ार साहब को ये गीत कैसे मिला।

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